याद आती है

 जानी पहचानी राहों में भी हम, 

भटकने से जब लग जाते हैं।

घर में रहने वाले दिन थोड़े से कम,

और घर से बाहर रहने वाले दिन बढ़ जाते हैं।


जब हम घर-वालों से ज़्यादा दिन-भर,

अजनबीयों से ही मिल पाते हैं।

घर से भी दूर एक और घर,

ना जाने कैसे हम बनाते हैं।


घर-वालों की याद आने पर जब हम,

बात तक उनसे ना कर पाते हैं।

मुँह पर चुपी और आखें थोड़ी सी नम,

किसी को कुछ बता भी ना पाते हैं।


घर के खाने से ज़्यादा तो,

घर में मम्मी-मम्मी बुलाना याद करते हैं।

पापा से अब कोई फ़रमाइश नहीं रही, क्यों?

बस पापा का घर वापस आने का इंतज़ार वापस चाहते हैं।


पापा-मम्मी की झलक भी,

आखों से ना उतार पाते हैं।

हम हार तो नहीं जाएँगे कभी?

यह सोच कर ही घबराते हैं। 


याद ना आए उन अपनों की, 

क्यों ना एसे भी दिन आते हैं?

दिन-भर उनको याद करके भी,

रात को हम अकेले से ही रह जाते हैं।


ख़ुशी सी लेकर हर रोज़ यूँ,

दिल ही दिल याद भुलाते हैं।

हज़ार लोगों से मिलकर भी क्यों?

हम बस उन अपनों के पास ही जाना चाहते हैं।


आखों में याद सी उनकी,

दिल में जो प्यार उनके लिए समाता है।

लोगों के आगे ज़िक्र और कहानियाँ हैं जिनकी,

सबको मेरा चेहरा उनसा नज़र आता है।

                                                                   ~आस्था!<3

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